Saturday, 30 April 2016

आज टूटी हुई है मेरी तान














आज टूटी हुई है मेरी तान
पंछियों की मीठी ध्वनि में
मिला लो मेरा दरिद्र गान।

जग के प्रदूषण से मेरा
बाल-मन हो गया मलीन
मेरे स्पर्श से उपवन के
पुष्प भी हो जाते हैं क्षीण।
खंडित हो गया मेरा ध्यान।

कैसे चढ़ूँ पावन मंदिर में
इन पाँवों पे चढ़ी है धूल
ह्रदय भी अब कलुषित है
मुझसे हुई है असीम भूल
पापमय हुआ है यह प्राण।

सुना है तेरा नाम लेना  भी
धो सकता है अपार मैल
तन-मन के कण-कण में
तेरा नाम-जप जाए फ़ैल
तेरे सान्निध्य का दे वरदान। 

Xavier Bage
Sun, May 01, 2016





Friday, 29 April 2016

जरा देख के रखिये अपने पाँव























जरा देख के रखिये अपने पाँव 
आपके पैरों तले दब सकता है 
चींटियों का कोई गाँव !

इस सुन्दर पृथ्वी पर जैसे 
मक्खी, मछली , मच्छर
जैसे साँप , मेढक , गोजर 
जैसे बाघ , भालू , हाथी 
मगरमच्छ , तिमी , हाँगर 
गैंडा , लोमड़ी और सियार 
वैसे ही हम मानव जाति 
हम सब पर है सृजक की छाँव !

इस मनोरम वसुंधरा पर 
जैसे नदी , पहाड़ और गुफाएं 
पेड़ , पौधे , कन्द मूल लताएं
सूर्य , ग्रह , तारे, किरण, जलराशि 
कोनों -कूचों के नागरिक तिलचट्टे 
छिपकली, मकड़ी, चूहे 
वैसे ही हैं इस धरा के वासी 
हम सब सवार एक ही नाव !

ये घर एक उपहार है
हमारे रहने के लिए एक साथ 
हम सब का है दिन, सबकी है रात 
अपने शहर बसाने के लिए 
उनका घरोंदा न उजाड़  देना 
न तोड़  देना उनके रास्ते 
अपना राजपथ बनाने के लिए 
हम सबका यही है ठाँव !

आपका एकाधिकार नहीं इस ग्रह पर 
हक़ है आपका इस धरती पर जितना 
है हक़ उनका भी इस पर उतना 
आप आदमी हैं  तो क्या है आज़ादी 
उच्छृंखल होकर करने का नाश 
ये धरनी नहीं रही तो कहाँ होगा निवास ?
बचना है साथ मरना भी है साथ 
सम्हलो जल्दी, हमारा जीवन लगा है दॉँव !


Xavier Bage
Fri, April 29, 2016

Wednesday, 27 April 2016

अगर मिल जाता रोशनी का इशारा




















अगर मिल जाता  इक रोशनी का इशारा
ज़िन्दगी कुछ और ही होती
अगर मिल जाता इक प्यार का सहारा
ज़िन्दगी कुछ और ही होती।

भटकती हुई इक नाव थी
थपेड़ों में लहरों के
अगर दिख जाता इक छोटा सा किनारा
ज़िन्दगी कुछ और होती। 


गरीबी के धक्के  खा-खा कर
गिर-गिरकर चलते रहे
अगर  होता दौलतमन्द घर हमारा
ज़िन्दगी  कुछ और ही होती।

आवाज़ों की भीड़ थी चौराहे पर
मन को भरमाने को
अगर मिल जाता सच का प्यारा
ज़िन्दगी और ही होती।

बुझते चले गए किस्मत के दीये
देकर उपहार अँधेरों का
जो होता आकाश में एक सितारा
ज़िन्दगी कुछ और ही होती।

ज़ेवियर बेज़
गुरु, अप्रैल 28 , 2016

Monday, 25 April 2016

खोया हुआ प्यार




















बहुत याद आता है खोया हुआ प्यार ,
तनहाई में रुलाता है खोया हुआ प्यार।

वो मुस्कान और वो  हँसी ,
जो मेरी रग -रग में बसी,
जब तब नाच जाती है नज़र के सामने।
बिजली-सा  चमक जाता है बहा हुआ संसार ,
बहुत याद आता है  खोया हुआ प्यार।

सहलाहट स्नेहिल हाथों की ,
प्रेरणा  स्वप्नमय बातों की ,
महसूसता है ये मन हर पल हर दिन।  
रेगिस्तानी लू  बन गया, मैं शीतल बयार,
बहुत याद आता है खोया हुआ प्यार।

ताका करता हूँ फूटा ये नसीब,
पेड़ों का साया भी न रहा करीब,
मिले थे कुछ लोग गले से लगानेवाले ;
बिछुड़कर चले गए सीमाओं के  पार ,
बहुत याद आता है खोया हुआ प्यार।

Xavier Bage
Mon, April 25, 2016

Saturday, 23 April 2016

माँ- बाप के प्यार बिना वो बच्चा



























कल मिला था प्लेटफार्म पर 
आज दिखा वह बाज़ार में 
कल मिल जायेगा कहीं और 
गली में  या मंदिर द्वार में

माँ- बाप के प्यार बिना 
लिपटा  हुआ वो  चिथड़ों में
सो लेता है नग्न धरा पर 
जीता  भीख के टुकड़ों में

भीख न मिले तो कूड़ेदान में 
मिल  जाते हैं जूठन प्लेट 
कुत्तों से छीना -झपटी कर 
बुझा लेता है जलता पेट

शर्म  हो तुझको हे मानव 
जो एक बच्चा है लाचार 
दो इंसान क्या आगे आकर 
दे नहीं सकते थोड़ा प्यार ?

ले आया हूँ इस बचपन को 
एक बाल-आश्रम के गाँव 
भाई-बहन का साथ रहेगा 
मिल जाएगी प्यार की छॉंव


Xavier Bage
Sun, April  24, 2016

Thursday, 21 April 2016

ओ चाँद , ओ हसीन आसमानी मुसाफिर

 













ओ चाँद ,  ओ हसीन  आसमानी मुसाफिर
तुझसे है मेरा जन्मजात लगाव
मेरा शासक ग्रह है तू
तेरे बिन न चल सकेगी
मेरे जीवन की नाव !

यह तो सभी जानते हैं
पृथ्वी तुझको खींचती है
तेरी मदिर-मधुर चाँदनी
हर प्राण को सींचती है
लेकिन मुझसे है  क्यों 
तेरे मन का खिंचाव?

दूर से हँसा करता है 
कभी  न आता है करीब 
अपने इस चातक कवि को 
क्यों रखा है भूखा ग़रीब ?
चली न जाए यह दुबली जान 
सह-सह दुःख के दबाव !

कहते हैं तेरी धरती में 
न हरियाली है न पानीहै 
न पेड़ों की डाल न पंछी हैं 
न नदियों की रवानी है 
क्या इसीलिए बेरहमी से
पूनम-अमस जताते प्रभाव ?


ज़ेवियर बेज़ 

Fri, April 22, 2016

Tuesday, 19 April 2016

इक नदी गुजरती थी हमारे गाँव से होकर

 















इक नदी गुजरती थी हमारे गाँव से  होकर
हम बच्चे उसमे नहाते थे पानी में सो-सोकर

अब न वो धारा रही और  न रही वो लहरें
किनारे के पेड़ मुरझा गए दिन-रात रो-रोकर

 बच्चों का क्या दोष जो  नीतिहीन हो गए
जब  बड़े ही पी गए सब  नीतियां धो -धोकर

बौने कैसे हो गए इन पहाड़ों के बासिन्दे
ज़िन्दगी चढ़ती-उतरती है मुसीबतें ढो-ढोकर

पानी सूख रहा है अब  इन्सानों के अन्दर ही
आओ पेड़  लगाते जाएँ प्रेम -बीज बो-बोकर

ज़ेवियर बेज़
बुध, 20 अप्रैल 2016

Sunday, 17 April 2016

गर्मी ग़ज़ल


                               













गर्मी का मौसम आया है, पंखों को नहीं आराम 
दिन रात चलते रहना है, करते जाना  है   काम।

मुंह छुपाए चल रहे हैं, क्या किया है कोई  जुर्म?
सूरज फसल बम्पर है, बाज़ार में घट गया दाम।

कोक-ठंडी जितनी लो चूस, लस्सी लोटा ले लो पी 
प्यास ज़ालिम ये जाती नहीं, क्या सुबह क्या  शाम।

कितनी जानें ले गया यम,  कर  बहाना  गर्मी   का 
राजनीति का अनियम भी, भेज रहा है बैकुण्ठ धाम।

जाड़े  में  भी   मरते   हैं,   गर्मी में भी जाते हैं प्राण 
गरीबों की किस्मत बनायी, बिना रहम तूने हे राम !


Xavier Bage
Sun, April 17, 2016 
                                                            

Saturday, 16 April 2016

उम्मीद है एक नन्ही चिड़िया
















उम्मीद है एक नन्ही चिड़िया
अंतर्मन  की डाल पर,
मीठी एक तान गाती  है
जीवन के धुन-ताल पर !

कभी नहीं वो थमती है
आंधी हो या हो तूफ़ान,
अँधेरा जब गहरा जाए
और मधुर होती है तान!

बर्फीली अकेली जगह हो
या फिर तपता हुआ  सहर,
अजनबी  समुद्री लहरें हों
या फिर सुनसान हो डगर,

उम्मीद है वो स्वर्ग-किरण 
दूर तमस जो भगाती है,
मृतप्राय मानव मन को 
अमृत पिला जगाती है!

उम्मीद है एक नन्ही चिड़िया 
अंतर्मन की डाल पर ,
मीठी एक तान सुनाती है 
जीवन के धुन-ताल पर !


ज़ेवियर बेज़ 
Sat, April 16, 2016

Thursday, 14 April 2016

दुनिया देखता हूँ बैठे -बैठे राह किनारे

 















दुनिया देखता हूँ बैठे -बैठे राह किनारे 
दिन कट जाते हैं इसी काम के सहारे !

 गुजरते हैं पास से कई तरह के पाँव,
शहर की ओर जाते हुए छोड़के  गाँव।
पीछे रह गए हैं घर व खेत बिचारे !

प्रेमी जोड़े चलते हैं हाथ में डाले हाथ ,
वादा वे  करते हैं जीवन भर का साथ।
कुछ को याद रहे कुछ ने सहज बिसारे !


रंग -विरंग के झंडे लिए मचाते हुए शोर,
जन-सेवकों के दल में जुड़ जाते हैं चोर।
जनता खड़ी रह  जाती है अपने हाथ पसारे !


क्यों बवाल है जो गरीब लिए गए लूट,
हल्ला तब करना जब लुटे पहने हुए सूट.
इन्साफ भी दरअसल एक आँख निहारे !



ज़ेवियर बेज़ 
Fri, April 15, 2016

Tuesday, 12 April 2016

डॉक्टर, मुझ पर कीजिए उपकार















डॉक्टर, मुझ पर कीजिए उपकार


डॉक्टर, मुझ पर कीजिए  उपकार
मेरी स्किन को देखिए न
खुजलवाती है दिन रात
कुछ तो कर दीजिए उपचार।

 न मेरा कोई मालिक है
न है मेरा कोई निवास
कूड़े पर सोया करता हूँ
खाकर सड़ा- गला  ग्रास ।
सह रहा हूँ किस्मत की मार।

गली का कुत्ता कहलाता हूँ
मेरा नहीं  है कोई नाम
कोई मुझे पास बुलाता नहीं
कहके रॉकी, राजा, टॉम।
मुझे कोई नहीं करता  प्यार।

सीधी राह मैं चला करता हूँ
न कोई अभ्यास है ख़राब
बीड़ी-सिगरेट नहीं पीता हूँ
ना मुंह लगायी  है शराब।
किस पाप का ढो रहा हूँ भार।

पैसे तो न दे सकूँगा मैं
मैं हूँ एकदम ही गरीब
गुलाम बनकर सेवा करूँगा
हूँगा सदा आपके करीब।
इस रोग से दिलाइए निस्तार।

ज़ेवियर बेज़

Wed, April 13, 2016

Monday, 11 April 2016

ओ गिलहरी




















 ओ गिलहरी 

ओ गिलहरी, ओ गिलहरी 
तेरी ज़िन्दगी
कितनी आनन्दभरी !

कभी ज़मीन पर, कभी पेड़ पर 
कभी खेत में, कभी मेंड़ पर 
कभी फुदकती, कभी बदकती 
नन्ही, प्यारी, चुलबुली आकाशपरी !

क्या खाती है, क्या पीती है 
कितनी खुशी में तू जीती है 
कभी उदास न देखा तुझे 
धारी वाली छरछराती कोई फूलझरी !

 रुपया-पैसा नहीं कोई मकान नहीं 
सोना-चांदी नहीं , कोई बगान नहीं 
तेरी मस्ती का राज़ क्या है 
सच्ची-अच्छी  बात बता दे खरी !

ज़ेवियर बेज़ 
Mon, April 11, 2016

Sunday, 10 April 2016

ओ सूरज, क्यों उगल रहे हो आग ?







ओ सूरज, क्यों उगल रहे हो आग ?



ओ सूरज क्योंकर इतना
उगल रहे हो आग ?
पृथ्वी के प्राणियों से तुम्हें
क्यों हो गया है राग ?

पेड़ों की डालें झुकने लगी हैं
पत्तों की साँसें रुकने लगी हैं
फूलों का दम घुट चुका है
तड़प रहे हैं कोयल और काग।

तपती धरती जलाती है पाँव
प्यासा है खेत, प्यासा है गाँव
कुआँ भी उदास- उदास  है
नदी के मुख पर दिख रहा झाग।

काश कि होते मेघ दो एक
बरसती आग से देते जो छेक
शाम तक  होता कुछ आराम
बच जाते किसी तरह लोग-बाग़।


ज़ेवियर बेज

रवि , अप्रैल 10 , 2016

Friday, 8 April 2016

यही है वो पल




















यही है वो पल


यही है वो क्षण 
यही है वो पल 
इस बंद  कमरे से 
बाहर तो निकल 
कदम तू बढ़ा ले 
किसी और की ओर 
कर ले तू एक पहल 
यही है वो पल।
  
आनेवाला कल कभी नहीं  आता 
जो आज है पल  चलता ही जाता 
जो करना है अभी ही करना है 
जो नहीं किया तो आहें भरना है 
समय रहते करना है भलाई 
हवा में  क्यों  बनायें महल 
यही है वो पल। 

दुनिया में बहुत है घना अँधेरा 
बहुतों को चाहिए नया सबेरा 
तेरे भीतर  एक सितारा है 
जादुई  चमक का एक पिटारा है 
बिखेरकर  किरणें प्यार की 
बुराई का धोना है गरल। 
यही है वो पल।

जीवन क्या है ज़रा सोच ले 
किसी के नैन से आंसू पोंछ ले 
बन जा एक डूबते का सहारा 
एक लफ्ज़ भी देता है किनारा 
जाने ना दे कोई अवसर 
हर एक मुहूर्त है विरल !
यही है वो पल !

ज़ेवियर बेज 
Fri, April 8, 2016