Monday, 30 May 2016

मयखाने के बाहर दो खरगोश

 




















मयखाने  के बाहर दो खरगोश
न कोई फ़िक्र है, न कोई ग़म
ख़ुशी भी दिल में न कोई कम
नाचे जा रहे हैं दो मदहोश !

आकाश में हँस रहा है चाँद
झाड़ियों से आ रहा है संगीत
हजारों कीड़े गा रहे हैं गीत
हमें आज नहीं लौटना है माँद !

दिन गुज़र गया पसीने में
रात की आज़ादी हमारी है
सितारों की बस्ती प्यारी है
ज़िन्दगी का ज़ज़्बा सीने में !

हम बिल्लियाँ नहीं हैं शौकीन
जो गोदियों  में बैठा करती हैं
मालकिन के पैसे ऐंठा करती हैं
हमें महलों की ज़िन्दगी तौहीन !

मयखाने के बाहर दो खरगोश 
बेफिक्री से नाचे जा रहे हैं 
दिल खोल गाए जा रहे हैं 
क्या जरूरी है रखना होश ?



Xavier Bage
Mon, May  30, 2016




Thursday, 26 May 2016

कँटीले तार लगाए क्यों सिंधु-गंगा के बीच



दुश्मनी बहुत कर ली दोस्ती की शुरुआत करें 
अमन से सब जी सकें उस बस्ती की शुरुआत करें 

रेखाएँ खींची ज़मीन पर दिलों को किया दूर 
मोड़कर  कदम अपने वापसी की शुरुआत करें 

मज़हब के बहाने हमने नफरत बहुत कर ली
हर इंसान की इज़्ज़त में बंदगी की शुरुआत करें 

गोलियाँ बहुत चलायीं मौत बहुत बांटा  किए 
चलो अब नए सिरे से ज़िंदगी की शुरुआत करें 

फ़र्क़ के गीत बहुत गाये बजाए जिहादी ढोल 
इंसानियत के नाम पर शायरी की शुरुआत करें 

कँटीले तार लगाए क्यों सिंधु-गंगा के बीच 
नहरों में पानी आए-जाए रवानी की शुरुआत करें 

Xavier Bage
Thurs, May, 26, 2016

Monday, 23 May 2016

माँ की तरह लोरी सुनाती है बारिश ,

























माँ की तरह लोरी सुनाती है बारिश ,

बड़ी मीठी नींद सुलाती है बारिश !


एक जादू-सा  है बूँदों के ताल में  ,

सपनों की दुनिया बुलाती है बारिश !


जीवनदायी होता है उसका स्पर्श ,

बुझी हरियाली को जगाती है बारिश !


आसमानी बरक़त है हर जान के  लिए,

खुशियों के गाँव बसाती है  बारिश  !


बारिश से रखो प्यार जैसे वो करती ,

वो सब करो जो बचाती है  बारिश ! 



Xavier Bage
Mon, May 23, 2016

Saturday, 21 May 2016

जुगनू कुछ नहीं होता


















दिन के उजाले में देखो तो 

जुगनू कुछ नहीं होता 

होता है एक बदसूरत कीड़ा 

दो डैने मटमैले-मटमैले 
दो बेढंगे से पैर 
बदन का रंग भूरा-भूरा 

मक्खी का एक रूप दूसरा !


रात के अँधेरे में 
उसकी अदाएँ तो देखो

उसकी नखरे तो देखो 
उसका गुमान तो देखो

सूरज की रोशनी की  साफगोई 

उजागर कर देती है 

उसका असली चेहरा !



अगर जानना हो सच्चाई 

पास जाके देखो जरा 

अगर असलियत को  है पाना 

खोजा करो रोशनी के  साथ 

बहुत कुछ छिप जाता है 

अँधेरे के परदे के पीछे 
नज़रों को रोकता है काला कोहरा!





Xavier Bage

Sat , May 21 , 2016 

Wednesday, 18 May 2016

कुछ निशाँ छोड़ जाऊँगा



















ज़िन्दगी के  बालू पर कुछ निशाँ छोड़ जाऊँगा ,
चाहे मिटा दें ये लहरें कुछ बयाँ छोड़ जाऊँगा। 

पूरा रास्ता न भी बना सका तो क्या हुआ,
दो एक चट्टानें यहाँ ज़रूर फोड़ जाऊँगा।

दयालु खुदा ने कुछ वरदान दिए हैं मुझे  ,
कुछ टूटे  हुए दिल मैं ज़रूर जोड़ जाऊंगा।

कुछ याद रहेंगे ज्यादा भुला दिए जायेंगे  ,
कुछ गीतों से जहाँ की राहें मोड़ जाऊंगा। 

इंसान जनम लिया तो इंसानियत करनी है ,
ख़ुदग़र्ज़ी  की कुछ आदतें ज़रूर तोड़ जाऊँगा।

कुछ फसल प्यार की मुझे यहाँ लगानी है ,
दो एक कुदाल ही सही ज़मीन कोड जाऊँगा। 


Xavier Bage

Thurs, May 19, 2019