Thursday, 5 May 2016

सपनों के शमसान















ये बड़े-बड़े मकान 
क्यों लगते हैं इतने सुनसान ?
क्या इनमे नहीं रहते हैं 
बोलने-हँसने वाले इन्सान ?


रहता जरूर है कोई न कोई 
किसी में रहती एक बूढी जोड़ी
किसी में कोई अकेला दादा 
रहती हैकिसी में कोई दादी 
जिनके ढल चुके हैं दिनमान। 

कभी ये बड़े- बड़े मकान थे 
चहचहाते पंछियों के नीड़
खुशियों  की किलकारियों की 
हँसते-खेलते बच्चों की भीड़ 
सागर पार उड़ गए वे तुतले गान। 

अब इन चुपचाप मकानों में 
पुरानी  यादें ही रहती हैं 
ज़िन्दगी के  आखिरी दिनों को 
आँसू बहा-बहा कर सहती हैं। 
ये अहाते है सपनों के शमसान। 

ज़ेवियर बेज़ 
शुक्र, मई 06, 2016

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