ये बड़े-बड़े मकान
क्यों लगते हैं इतने सुनसान ?
क्या इनमे नहीं रहते हैं
बोलने-हँसने वाले इन्सान ?
रहता जरूर है कोई न कोई
किसी में रहती एक बूढी जोड़ी
किसी में कोई अकेला दादा
रहती हैकिसी में कोई दादी
जिनके ढल चुके हैं दिनमान।
कभी ये बड़े- बड़े मकान थे
चहचहाते पंछियों के नीड़
खुशियों की किलकारियों की
हँसते-खेलते बच्चों की भीड़
सागर पार उड़ गए वे तुतले गान।
अब इन चुपचाप मकानों में
पुरानी यादें ही रहती हैं
ज़िन्दगी के आखिरी दिनों को
आँसू बहा-बहा कर सहती हैं।
ये अहाते है सपनों के शमसान।
ज़ेवियर बेज़
शुक्र, मई 06, 2016

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