मैं कुछ न भी कहूँ
तौभी मेरी खामोशी
बहुत कुछ कहती है,
मेरे मन की आवाज
अदृश्य पवन की तरह
इस फिजाँ में बहती है।
कुछ लोगों के लिए
मेरा यहाँ होना भी
बहुत खटकता है,
मेरी नीरव चुप्पी से
कोई खुदगर्ज़ काम
कहीं अटकता है !
एक मौके का इन्तज़ार है
शातिर एक करके साजिश
चाहेंगे मुझे मिटाना,
नहीं मालूम है उन्हें
लेकर मेरी जान भी
असंभव मुझे हटाना।
शरीर नहीं हूँ मैं
एक अमर आत्मा हूँ
इस चमन में स्वाधीन ,
एक छोटी किरण हूँ मैं
पर बड़े अंधेरे भी
मेरे समक्ष होते विलीन !
जेवियर बेज़
बुध, जून 15 , 2016

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