
एक मानव से क्या-क्या लेती है करा
एक भलेमानुस को बना देती है बुरा
जिस बेहया चीज का नाम है मज़बूरी !
झुका देती है उसे भी
जिसने झुकना न सीखा
रोक देती है उसे भी
जिसने रुकना न सीखा
एक ईमानदार आत्मा का
ईमान तक लेती है चुरा
जिस बेहया चीज का नाम है मजबूरी !
सीधी राहें छोड़ कर उसे
टेढ़ी गलियों में पड़ा चलना
दुखों की आग में तिल -तिल
बार-बार उसे पड़ा गलना
मार-मार कर बेरहमी से
छोड़ चल देती है अधमरा
जिस बेहया चीज का नाम है मजबूरी !
कभी कोई अंग बेचकर अपना
लंगड़ाते हुए पड़ता है जीना
ज़िन्दगी जो जहर बनाये ग़म से
घूँट-घूँट उसे पड़ता है पीना
मृत्यु के कठोर आलिंगन में
जीवन का एक-एक दिन दे झरा
जिस बेहया चीज का नाम है मजबूरी !
ज़ेवियर बेज़
मंगल , जून 28 , 2016
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