Tuesday, 28 June 2016

जिस बेहया चीज का नाम है मज़बूरी





















एक मानव से क्या-क्या लेती है करा
एक भलेमानुस को बना देती है बुरा
जिस बेहया चीज का नाम है मज़बूरी !

झुका देती है उसे भी
जिसने झुकना न सीखा
रोक देती है उसे भी
जिसने रुकना न सीखा
एक ईमानदार  आत्मा का
ईमान तक लेती  है चुरा
जिस बेहया चीज का नाम है मजबूरी !

सीधी राहें छोड़ कर उसे
टेढ़ी गलियों में पड़ा चलना
दुखों की आग में तिल -तिल
बार-बार उसे  पड़ा गलना
मार-मार कर बेरहमी से
छोड़ चल देती है अधमरा
जिस बेहया चीज  का नाम है मजबूरी !

कभी कोई अंग बेचकर अपना 
लंगड़ाते हुए पड़ता  है जीना 
ज़िन्दगी जो जहर बनाये  ग़म से 
घूँट-घूँट उसे पड़ता है पीना 
मृत्यु के कठोर आलिंगन में 
जीवन का एक-एक दिन दे झरा 
जिस बेहया चीज का नाम है मजबूरी !





ज़ेवियर बेज़ 
मंगल , जून 28 , 2016  

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