दुःख के दिन आये पू के
दी ने उससे नज़र फिरा ली
दिल जीता था पल आँसू के।
कभी मिल के पूछा लिया
'क्यों कर रही हो ये सलूक ?'
दी ने कोई केयर न किया।
'बेवकूफ हो जो दोस्ती को
सीरियस तुमने ले लिया
बेहाल किया ज़िन्दगी को। '
'जो हो, एक बार आ जाना
एक साथ पिकनिक कर लें
फिर तुम चाहो जुदा हो जाना। '
एकांत वन में पिकनिक चला
दी के लम्बे बालों से ही
पू ने उसका दबाया गला !
बगल में स्मार्ट-फ़ोन बजा
लेनेवाली आस-पास नहीं थी
मिली थी उसे दगे की सज़ा।
(समाप्त )
Xavier Bage
Mon, July 11, 2016
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