झूल रही है ज़िन्दगी
पकड़े एक पतली डोर
न जाने कब दगा दे दे
बिना मचाए शोर!
दिन के उठते-ढलते
राहों पे चलते-चलते
किसी से हुई मुलाक़ात
नैनों में ला देती लोर !
हर जगह भीड़ ही भीड़
दूर है अपना घर-नीड़
पहुँच पाएँ भी या नहीं
काँटे ही काँटे सब ओर !
किस चीज का करें गरूर
हर तरह से हैं मज़बूर
सोते- जागते किसी वक़्त जान
चुरा ले सकता है चोर!
Xavier Bage
Tues, 20 July 2016

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