Wednesday, 20 July 2016

झूल रही है ज़िन्दगी



 












झूल रही है ज़िन्दगी 
पकड़े एक पतली डोर 
न जाने कब दगा दे दे 
बिना मचाए शोर!

दिन के उठते-ढलते 
राहों पे चलते-चलते 
किसी से हुई मुलाक़ात 
नैनों में ला देती लोर !

हर जगह भीड़ ही भीड़ 
दूर है अपना घर-नीड़ 
पहुँच पाएँ भी या नहीं 
काँटे ही काँटे सब ओर !

किस चीज का करें गरूर 
हर तरह से हैं मज़बूर
सोते- जागते किसी वक़्त जान 
चुरा ले सकता है चोर!

Xavier Bage
Tues, 20 July 2016

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