भट-भट करती नाव चली हुगली पर
उस पार बंडेल है इस पार हालिसहर !
चुपचाप बहती है नदी
बिना किए कोई आवाज़
जैसे कोई ग्राम- बाला चले
आँचल में छिपाए लाज
लगे कहीं न ठेस कोई इसका है डर !
झाड़ियों के पीछे से
हुलक रहे कुछ मकान
दूर चलते लोगों से अपनी
ना जान है ना पहचान
फिर भी हम हैं सहयात्री
जा रहे हैं हम सब एक पिता के घर !
हिमालय में हुआ सफर शुरू
सागर में होना है विलीन
जीवन की राह चलते-चलते
वस्त्र बहुत हो गए मलीन
किस मंदिर में जल है ऐसा
जो चलायमान तन की मैल ले हर?
Xavier Bage,
Mon, July 04, 2016

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