वो पगली बेचारी
रास्तों पर भटकती हुई
वो किस्मत की मारी !
कोई तो शौक से पागल नहीं होता
पागलपन के पीछे जरूर
होगी कोई कहानी
जरूर रही होगी वो
प्यार करने वाले माँ-बाप की
गुड़िया बिटिया रानी
ममतामय हाथों से खानेवाली
आज चाट रही है जूठन -थारी !
बस स्टॉप शेड के पीछे
दुबककर बच जाती है
प्लास्टिक से लिपटकर मौसम की मार
लेकिन उन कुत्तों से कैसे बचे
जो किया करते हैं
नारी-देह का शिकार ?
लज्जा होती है अपने आप पर , आदमी पर
जो कसमसाता नहीं देख अन्याय भारी !
Xavier Bage
Thurs, 14 July 2016

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